Tuesday, May 21, 2013

कलिम्पोंग में भी कोयलाचोरी!

कलिम्पोंग में भी कोयलाचोरी!


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​


कोयलाखान हो और कोयला की चोरी न हो, ऐसा असंभव है। कोयला तस्करी के लिए गिरोहबंदी बहुत जरुरी भी नहीं है। कोयलांचलों के बड़े दायरे में असंख्यखानों से कोयला की तस्करी के लिए माफिया और तस्करों के सुसंगठित गिरोह होते हैं,जो कोयला ही नहीं कोयलांचल में जीवन के हर क्षेत्र को नियंत्रित करते हैं। लेकिन दार्जिलिंग जिले के कलिंगपोंग इलाके के दो कोयलाखानों से दशकों से वनकर्मियों की खुली मदद से जो कोयलाचोरी हो रही है, उसका क्या कहेंगे?


ये खानें कलिंगपोंग फारेस्ट कार्पोरेशन के अधिकार क्षेत्र में हैं जो पुलिस नियंत्रण से बाहर हैं।इन खानों से कोई कोयलाकंपनी कोयला नहीं निकालती। स्थानीय लोग ही रोज कोयला निकालकर वनकर्मियों की मदद से सिलिगुड़ी को रास्ते ​​दूर दूर तक डुआर्स, मेखलीगंज और कूचबिहार तक भेज देते हैं।


इन खानों से व्यवसायिक तौर पर खनन होता नहीं है क्योंकि यहां खनन पहाड़ के पर्यावरण और भूगर्भीय संरचना के लिए खतरनाक है।कोयला निकालने की वजह से इस इलाके में अक्सर भूस्खलन होते रहते हैं।


वनमंत्री हितने वर्मा ने अपने अधिकारियों को कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। दूसरी ओर वनविभाग के अधिकारियों ने कोयलाचोरी में वनकर्मियों  की मिलीभगत के आरोप को सिरे से खारिज करते हुए दावा किया कि वनकर्मी ही पर्यावरण के लिए बेहद संवेदनशील इन खदानों की हिफाजत करते हैं।कलिंगपोंग की पाबरिंगटा ग्रामपंचायत के अंतर्गत येदोनों खदानें हैं।


इसीतरह वीरभूम जिले के हजरतपुर में चल रहे बंगाल एम्टा के ओसीपी खदान से उत्पादित कोयले को लादकर आ रही मालगाड़ियों से बड़े पैमाने पर कोयले की चोरी हो रही है।कोयला लादकर मालगाड़ी जब अंडाल सैथिया रेलखंड पर भीमगढ़ा स्टेशन के पहले पहुंचती है तो वहां पहले से ही कोयला चोरों का हुजूम जमा रहता है। हालांकि कांकड़तल्ला एवं खैरासोल थाने की पुलिस को कोयले से लदी मालगाड़ी को सुरक्षित ले जाने की जिम्मेवारी दी गयी है।


Thanks to Parul Sharma and 200 Swedish donors for first support of ten thousand to Family through Ms. Shruti Nagvanshi,( http://shrutinagvanshi.com/we-as-team/shruti-nagvanshi/) Founder and managing trustee of PVCHR.

http://www.pvchr.net/2013/05/weavers-family-gets-govt-help-only.html

Thanks to Parul Sharma and 200 Swedish donors for first support of ten thousand to Family through Ms. Shruti Nagvanshi,(http://shrutinagvanshi.com/we-as-team/shruti-nagvanshi/) Founder and managing trustee of PVCHR. 

"Some people are spreading misleading information that the children died of diarrhea but that is not true. These children died of hunger and malnutrition," said Shruti.

http://www.ndtv.com/article/cities/mother-of-five-watches-helplessly-as-two-of-her-children-starve-to-death-in-varanasi-367025

Shruti, head of a human rights organisation, working among weavers in Varanasi says that Naazra had an Above Poverty Line (APL) card. However, soon after the death of her two children, the district administration lost no time to issue her a BPL card. The Weaver Card will enable her to avail the benefits of welfare schemes.
Questioning the 'benevolence' of the district administration, Shruti said, "If the family was not under extreme poverty and malnutrition, why have they been given a BPL card, Weaver Card and food grains? How can the district administration claim that the two children died of the disease when the post mortem of the bodies was not conducted?"

She maintained that the Naazra family suffered from extreme poverty and malnutrition. Whatever little Naazra earned as a saree weaver, went in purchasing foodgrains. The family was dependent on doles from neighbours, but the financial condition of neighbours was also not good.

http://tehelka.com/hunger-stalks-temple-town-of-varanasi/

उत्तर प्रदेश के बनारस में नजरा खातून के दो बच्चे भूख से मर गए। आखिर कब तक भूख से देश में मौत होती रहेगी... इसी पर बड़ी खबर में चर्चा... Thanks Shruti for great intervention. Keep fight against hunger and malnutrition
http://khabar.ndtv.com/video/show/badi-khabar/275270

While one member of the family, Nazia Parveen had high fever at that time but they did not consider it important to give medicine to get relief. When the regional officer was contacted on phone by a member of PVCHR in this regard, he replied that while coming from CMO's office, he would deliver the medicines. After 2 pm in the afternoon, the social activists of PVCHR took Nazia to a private hospital nearby for the treatment where on the advice of the doctor, X-Ray and blood tests of Nazia were done. Nazia had been complaining of high fever and cough. On the basis of doctor's prescription Nazia was given paracetamol, anti-biotic and energy related medicines.

http://www.merinews.com/article/weavers-family-gets-govt-help-only-after-hunger-consumes-four-lives/15885780.shtml
Unlike ·  ·  · 6 minutes ago near Varanasi, Uttar Pradesh · 

अलविदा शांति तिग्गा!

अलविदा शांति तिग्गा!













हिंदू साम्राज्यवाद को अटूट रखने की परिकल्पना एच एल दुसाध

गैर-मार्क्सवादियों से संवाद-14    

हिंदू साम्राज्यवाद को अटूट रखने की परिकल्पना   

                                           एच एल दुसाध

शक्ति के स्रोतों को अपने वंशधरों के लिए आरक्षित करने की शासकों की स्वाभाविक इच्छा के वशीभूत होकर वैदिककालीन शासक गोष्ठी ने वर्ण-व्यवस्था को जन्म दिया.इसके लिए उन्होंने मानवजाति की सबसे बड़ी कमजोरी पारलौकिक सुख(मोक्ष) को हथियार बनाया.मोक्ष के लिए उन्होंने स्व-धर्म पालन को आवश्यक बताया तथा स्व-धर्म पालन के लिए कर्म-शुद्धता को अत्याज्य कर्तव्य घोषित किया.कर्म-शुद्धता की अनिवार्यता और कर्म-संकरता की निषेधाज्ञा के फलस्वरूप शुद्रातिशूद्र, जीवन का चरम लक्ष्य मोक्ष अर्जित करने के लिए अध्ययन-अध्यापन,पौरोहित्य,राज्य  संचालन,सैन्यवृत्ति,भूस्वामित्व,पशुपालन,व्यवसाय–वाणिज्यादि से विरत रहकर शक्तिसंपन्न तीन उच्च वर्णों की निष्काम सेवा में  निमग्न होने के लिए बाध्य हुए.किन्तु वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक सिर्फ कर्म-संकरता(पेशों की विचलनशीलता) को निषेध घोषित आश्वस्त न हो सके.उन्हें भय था कि दैविक-दास में परिणत की गई मूलनिवासी आबादी सिर्फ नरक -भय से चिरकाल के लिए शक्ति के स्रोतों की वंचना को झेल नहीं सकती.वह संगठित होकर उनको चुनौती दे सकती है.ऐसे में उन्होंने अपने भावी पीढ़ी के सुख ऐश्वर्य के लिए भारतीय समाज को विच्छिन्नता और वैमनस्यता की बुनियाद पर विकसित करने की परिकल्पना की.इसके लिए भ्रातृत्व को बढ़ावा देनेवाले हर स्रोत को रुद्ध किया.भिन्न-भिन्न जाति/वर्णों के विवाह के माध्यम से एक दूसरे के निकट आने पर  भ्रातृत्व को बढ़ावा मिल सकता था इसलिए जाति-समिश्रण अर्थात  वर्ण-संकरता को महापाप घोषित कर अंतरजातीय विवाह को निषेध कर दिया.सजाति की छोटी-छोटी परिधि में वैवाहिक सम्बन्ध कायम होते रहने के फलस्वरूप भारतीय समाज चूहे की एक-एक बिल के समान असंख्य भागों में बंटने के लिए अभिशप्त हुआ.अपनी इस परिकल्पना को बड़ा आयाम देने के लिए उन्होंने न सिर्फ वर्ण –संकरता को महापाप घोषित किया बल्कि उसकी सृष्टि की हर सम्भावना को निर्मूल करने का उपाय भी किया.

वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तकों ने सजाति  के मध्य विवाह को अनिवार्य कर समाज को छोटे-छोटे समूहों में बंटे रहने का सुबंदोवस्त किया ही,उनका जन्मजात सर्वस्वहाराओं से रक्त सम्बन्ध स्थापित न हो पाए ,इसके ही लिए उन्होंने  सती,विधवा,बालिका-विवाह बहुपत्निवादी जैसी प्रथाओं को जन्म दिया.सुविधाभोगी वर्ग की महिलाएं और उनके अभिभावक इन प्रथाओं के अनुपालन में स्वतःस्फूर्त से योगदान करते रहें,इसके लिए शास्त्रकारों ने हजारों अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य लाभ की प्रतिश्रुति दिया.महापंडित राहुल सांकृत्यायन के मुताबिक सती-प्रथा के अंतर्गत भारत के सुदीर्घ इतिहास में सवा करोड़ नारियों कों अग्निदग्ध करके मारा जा चुका है.इसी तरह विधवा-प्रथा के तहत जहाँ अरबों नारियों कों जिंदा लाश में परिणत किया गया वहीँ कोटी-कोटि बच्चियों कों बालिका-विवाह प्रथा के अंतर्गत बाल्यावस्था से सीधे युवावस्था में प्रविष्ट करा दिया गया.पोलिगामी(बहुपत्निवादी)प्रथा के तहत एक व्यक्ति की पचास-पचास  पत्नियों  को अपनी यौन कामना कों बर्फ बनाने के लिए कितनी संख्यक नारियों कों अपार यंत्रणा से गुजरना पड़ा  होगा,इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है.

हिंदू साम्राज्यवाद को कायम करने के इरादे से जिस वर्ण-व्यवस्था कों जन्म दिया गया उसकी मात्र यही खराबी नहीं रही कि इसके अंतर्गत वर्ण-संकरता कों महापाप घोषित कर कोटि-कोटि नारियों का निर्मम शोषण;सजाति विवाह के द्वारा विशाल समाज कों छोटे -छोटे टुकड़ों में बंटे रहने के लिए अभिशप्त तथा  बहुसंख्यक आबादी कों श्रम-यंत्र में परिणत कर विशाल मानव संसाधन के  दुरूपयोग का चूड़ान्त दृष्टान्त स्थापित किया गया.इसका एक भयावह परिणाम यह भी हुआ कि राष्ट्र चिरकाल के लिए प्रतियोगिता विहीन हो गया.पेशों की विचालनशीलता की वर्जना के कारण शिक्षा-संस्कृति और व्यवसाय-वाणिज्यादि किसी भी क्षेत्र में पूरे देश की प्रतिभाओं को  मिलजुलकर योग्यता प्रदर्शन का अवसर ही नहीं मिल पाया.प्रतियोगिता का विशाल मंच सजने ही नहीं दिया गया और यह सब हुआ एक योजना के तहत.इस योजना के तहत क्षत्रियों के शस्त्रों के साये में पालित शास्त्रों द्वारा मूलनिवासियों कों अस्त्र स्पर्श वर्जित और शिक्षा निषिद्ध कर प्रतियोगिता का मंच संकुचित कर दिया गया.शस्त्रहीन भारत में शस्त्रसज्जित क्षत्रिय जहां जन-अरण्य के सिंह जैसा आचरण करते रहे वहीँ शिक्षा निषिद्ध बहुजन समाज में मात्र धर्मग्रन्थ बांचने व श्लोकों का उच्चारण करने सक्षम लोग पंडित(ज्ञानी) की पदवी से भूषित हो गए.

चूंकि भारत के 'सिंह' और 'पंडित' एक प्रतियोगिता-शून्य समाज से उठकर क्षमता लाभ किये थे इसलिए उच्चतर पर्याय की प्रतियोगिताओं में बराबर फिसड्डी साबित होते रहे.यही कारण है कि जब शस्त्र-निषिद्ध समाज के 'सिंह' शस्त्र सज्जित समाजों के मोहम्मद बिन कासिम,गजनी,बख्तियारुद्दीन खिलजी,लार्ड क्लाइव इत्यादि से भिड़े तो देश को लंबी गुलामी देने से भिन्न और कुछ न कर सके.इसी तरह शिक्षा निषिद्ध समाज में महज कुछ लिपि ज्ञान और मंत्रोचारण में पारंगत पंडित जब अपने 'पांडित्य ' से मानव-सभ्यता के विकास में  योगदान के लिए आगे आये तो 33 करोड़ देवी-देवताओं कों आविष्कृत कर उनकी संतुष्टि के लिए तरह-तरह मन्त्र रचने के सिवाय  और कुछ न कर सके.कुदरत के खिलाफ जहिनी जंग छेड़कर मानव सभ्यता के विकास में जो योगदान कोपर्निकस,जिआर्दानो ब्रूनो,गैलेलियो,लिओनार्दो विन्सी,न्यूटन इत्यादि जैसे पश्चिम के मुक्त समाज के पंडितों ने दिया,हिंदू-ईश्वर के उत्तमांग से जन्मे  जन्मजात पंडितों के लिए उसकी कल्पना तक करना भी दुष्कर रहा.

प्रतियोगिताशून्यता का अभिशप्त सिर्फ सामरिक और शिक्षा का ही  नहीं बल्कि व्यवसाय-वाणिज्य का क्षेत्र भी रहा.वंश परम्परा से सामरिक और शिक्षा की भांति ही इस क्षेत्र में भी निहायत ही क्षुद्र संख्यक लोग ही प्रतिभा प्रदर्शन के अधिकारी रहे.इसलिए इस क्षेत्र में ऐसी श्रेष्ठतम प्रतिभाओं का उदय न हो सका जो इस्ट इंडिया कंपनी की भांति देश - देशांतर में अपनी व्यवसायिक प्रवीणता का दृष्टान्त स्थापित करतीं.इनकी क़ाबलियत का यह आलम रहा कि सदियों से देश का धन पूंजी में तब्दील होने के लिए तरसता रहा.                  

 बहरहाल वर्ण व्यवस्था के अमरत्व के रास्ते हिंदू-साम्राज्यवाद को अटूट रखने की परिकल्पना के तहत वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तकों ने सती-विधवा-बहुपत्निवादी और बालिका विवाह-प्रथा  के साथ अछूत और देवदासी जैसी प्रथाओं को जो जन्म दिया उसके फलस्वरूप इतना विराट सामाजिक समस्यायों का उद्भव हुआ कि परवर्ती काल में वर्ण/जाति के उन्मूलन के लिए  मैदान में उतरे तमाम महामानवों की उर्जा ही इनके खात्मे में क्षरित हो गई और वर्णव्यवस्था का कुछ बिगड़ा भी नहीं.दरअसल वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तकों ने उसके निर्माण के पीछे अपनी मनीषा का इतना बेहतरीन इस्तेमाल किया था कि इसकी अमानवीयता को गहराई से महसूस करने वाले अपवाद रूप से कुछ लोगों को छोड़कर, अधिकांश लोग ही गच्चा खा गए और इसका मुख्य पक्ष आर्थिक,उनकी नज़रों से अगोचर रह गया.अगर इसके खिलाफ संघर्ष चलने वाले लोग ,इसके निर्माण के पीछे साम्राज्यवादी-मनोविज्ञान की क्रियाशीलता को समझने की बौद्धिक कवायद करते तो उन्हें स्पष्ट रूप से यह प्रधानतः सम्पदा-ससाधनों और सामाजिक मर्यादा  की वितरण-व्यवस्था नज़र आती.फिर तो इसे मुख्य रूप से आर्थिक समस्या मानते हुए वे इससे आक्रांत लोगों(दलित,पिछड़े और महिलाओं) को शक्ति के स्रोतों –आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक- में उनका वाजिब शेयर दिलाने पर अपनी गतिविधियां केंद्रित करते .इससे हिंदू साम्राज्यवाद कब का  ध्वस्त हो गया  होता तथा राष्ट्र बेहिसाब आर्थिक और सामाजिक विषमता,दलित-पिछड़ा व महिला अशक्तीकरण सहित विच्छिन्नता व पारस्परिक घृणा जैसी कई समस्यायों से मुक्त हो गया होता. लेकिन जो अबतक नहीं हुआ क्या उसकी शुरुवात आज से नहीं की जा सकती?  

दिनांक:10 मई,2013

मित्रों! मेरा उपरोक्त लेख 12 मई को देशबंधु में प्रकाशित हुआ था किन्तु  विगत दो सप्ताह से 'लैपटॉप' ख़राब रहने के कारण इस लेख से जुड़ी शंकाएं आपके समक्ष नहीं रख पाया.अब मार्क्सवादियों को लेकर आपके समक्ष अपनी शंकाएं रखने का सिलसिला एक बार फिर शुरू कर रहा हूँ.वर्तमान लेख से जुडी अपनी निम्न शंकाएं आपके विचारार्थ रख रहा हूँ.

1-जिस तरह विश्व के प्राचीनतम साम्राज्यवादियों ने अपनी भावी पीढ़ी के लिए शक्ति के तमाम स्रोत चिर-स्थाई तौर पर आरक्षित करने के कुत्सित इरादे से मूलनिवासियों को शक्ति के स्रोतों से दूर रखने के लिए 'कर्म-शुद्धता' तथा उन्हें परस्पर कलहरत व विच्छिन्न रखने के लिए 'वर्ण-शुद्धता' का धार्मिक प्रावधान रचा क्या वैसा जघन्य कार्य विश्व इतिहास में अन्य साम्राज्यवादियों ने अंजाम दिया है?

2-कुछ लोग यह प्रमाणित करने की आप्राण चेष्टा करते हैं कि वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक आर्य विदेशी नहीं थे.किन्तु जिस तरह शुद्रातिशूद्रों को शक्ति के स्रोतों से पूरी तरह दूर रखने के साथ ही उनको अच्छा नाम रखने ; देवालयों में घुसकर ईश्वरोपासना करने एवं उनकी स्त्रियों को नाभि के ऊपर वस्त्र धारण करने से रोका गया ,उससे तय है कि देश के शासक समुदाय ने बहुसंख्यक लोगों के साथ घोरतर अनात्मीयता का परिचय दिया है.क्या विदेशी मूल के लोगों को  छोड़कर ऐसी अनात्मीयता का परिचय किसी स्वदेशी शासक समुदाय ने दिया है?                                                           

3-आप यह बतावें  आधी आबादी को आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक क्षेत्र में स्वतंत्र हिस्सेदारी से पूरी तरह वंचित करने के साथ ही जिस तरह अपने साम्राज्यवादी हथियार (वर्ण-व्यवस्था)को अक्षत रखने के लिए हिन्दू-साम्राज्यवादियों ने सती-विधवा-बहुपत्निवादी तथा बालिका विवाह प्रथा के जरिये कोटि-कोटि महिलायों को अग्निदग्ध करने तथा उनकी यौन कामना को बर्फ बनाने का अमानवीय कार्य अंजाम दिया है,वैसा क्या निजहित में  विश्व के किसी अन्य साम्राज्यवादी गोष्ठी ने भी किया है?

4-बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि आर्य अपने साथ महिलाओं को लेकर नहीं आये थे.अपनी भावी पीढ़ी के हित में वर्ण-व्यवस्था के अर्थशास्त्र को अटूट रखने के लिए उन्होंने जिस तरह विभिन्न-प्रथाओं के माध्यम से महिलायों का इस्तेमाल किया,उससे क्या इस बात पर मोहर नहीं लग जाती कि वे विदेशी थे ,जिस कारण ही उन्होंने देशीय महिलायों का विशुद्ध दासी के रूप में इस्तेमाल किया?

5-समाज विज्ञानी,समाज सुधारक  और साहित्यकार इत्यादि जाति/वर्ण –व्यवस्था की खामी प्रधानतः 'अछूत-प्रथा' में देखते रहे हैं.उनके लिए जाति-उन्मूलन का मतलब अछूत-प्रथा का उन्मूलन मात्र रहा है.किन्तु वर्ण-व्यवस्था में पेशों की विचलनशीलता(professional mobility )के निषेध के रास्ते जिस तरह हजारों साल से विशाल मानव-संसाधन की बर्बादी की गई तथा जिस तरह विभिन्न क्षेत्रों में प्रतियोगिताशून्यता  को बढ़ावा देकर प्रतिभाओं के उदय का मार्ग रुद्ध किया गया उस पर उन लोगों ने नहीं के बराबर ध्यान दिया.आप बतायें वर्ण-व्यवस्था के  विकरालता की उपेक्षा  के पीछे महज उनकी अज्ञानता रही है या कोई षड्यंत्र?

6-अगर उपरोक्त लेख में कर्म व वर्ण-शुद्धता तथा सती-विधवा-बहुपत्निवादी –बालिका विवाह तथा अछूत प्रथा के प्रदर्शित किये गए कुपरिणामों में   सच्चाई है तो क्या ऐसा नहीं लगता कि साम्राज्यवाद के खिलाफ संग्राम चलानेवालों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती हिन्दू-साम्राज्यवाद ही रही रही है.किन्तु शुद्रातिशूद्रों को छोड़कर दुनिया की अन्य साम्राज्यवाद विरोधी ताकतों ने इसके खिलाफ कोई संग्राम नहीं चलाया.अंग्रेज भारत में  जब पेरियार,शाहूजी,आंबेडकर इत्यादि हिन्दू साम्राज्यवाद के खिलफ संघर्ष चला रहे थे तब मार्क्सवादियों को वह लड़ाई व्यर्थ लग रही थी.आज भूमंडलीकरण के दौर में जब शुद्रातिशूद्र अम्बेडकरवाद से लैस होकर इसके खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं,मार्क्सवादी उन्हें अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ  अपनी उर्जा लगाने का उपदेश कर रहे हैं.क्या ऐसा नहीं लगता कि वे हिन्दू-साम्राज्यवाद से वंचितों का ध्यान हटाने के लिए ही ऐसा कर रहे हैं?

तो मित्रों आज इतना ही.मिलते हैं कुछ दिन बाद कुछ नै शकों के साथ.

               जय भीम-जय भारत                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             


आरक्षण पर संघर्ष के चलते शुंग भारत में तब्दील:बौद्ध भारत

आरक्षण पर संघर्ष के चलते शुंग भारत में तब्दील:बौद्ध भारत 

एचएल दुसाध

आरक्षण पर संघर्ष के चलते शुंग भारत में तब्दील:बौद्ध भारत

महान मार्क्सवादी विचारक महापंडित राहुल संकृत्यायन ने अपने  ग्रन्थ 'कार्ल मार्क्स' के विषय प्रवेश में लिखा है-'मानव समाज की आर्थिक विषमतायें ही वह मर्ज़ है,जिसके कारण मानव-समाज में दूसरी विषमतायें और असह्य वेदनाएं देखी जाती हैं .इन वेदनाओं का अनुभव हर देश-काल में मानवता-प्रेमियों और महान विचारकों ने दुःख के साथ अनुभव किया और उसको हटने का यथासंभव प्रयत्न भी किया.'आर्थिक विषमता को मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या चिन्हित करने के बाद उन्होंने ने डेढ़ दर्ज़न ऐसे मानवों का नामोल्लेख किया है जो 'विगत ढाई हज़ार वर्षो से एक ऐसे समाज का सपना देखते रहे ,जिसमें मानव सामान होंगे,उनमें  कोई आर्थिक विषमता नहीं होगी,लूट-खसूट ,शोषण-उत्पीडन से वर्जित मानव-संसार उस वर्ग का उप धारण करेगा ,जिसका लाभ भिन्न-भिन्न धर्म मरने के बाद देते हैं.'अवश्य ही महापंडित ने आर्थिक विषमता के खिलाफ मुक्कमल और वैज्ञानिक सूत्र देने का श्रेय कार्ल मार्क्स को दिया हैं, किन्तु मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या के खिलाफ जुझनेवालों में पहला नाम गौतम बुद्ध का लिया है.यह भारी दुःख का विषय है कि गौतम बुद्ध की छवि एक ऐसे व्यक्ति के रूप चित्रित  की गयी है जिसने अहिंसा के धर्मोपदेश के साथ पंचशील का दर्शन दिया है,जबकि सचाई यह है कि वे दुनिया के पहले ऐसे  क्रांतिकारी पुरुष थे जिन्होंने भूख अर्थात आर्थिक विषमता को इंसानियत की सबसे बड़ी समस्या चिन्हित करते हुए समतामूलक समाज निर्माण का युगांतरकारी अध्याय रचा .उनके कार्यों का मुल्यायन करते हुए सुप्रसिद्ध इतिहासकार एस के बिस्वास ने लिखा है-

'करुणाघन बुद्ध का अबाध मुक्त ज्ञानानुशीलन मुक्त किया मानव  के भाग्य विकास को .मुक्तज्ञान आत्मा का निर्वाणलाभ,युक्त किया ज्ञान के साथ प्रेम.इसलिए अर्यीकृत ब्राह्मणवादी वर्ण-वित्त संरचित जड़ समाज के पास ही,अव्याहत रूप से ध्वनित हुआ जातिहीन मुक्त वित्त;युक्ति-विचाराधारित वस्तुवादी समाज का कर्म चांचल्य भरा गतिमय प्रेम संगीत .किसी जाति विशेष का कल्याण नहीं;विशेष दल व सम्प्रदाय की मुक्ति नहीं;बहुजन के हित के उद्देश्य से ,बहुजन के सुख के लिए रचित हुआ एक महान शक्तिमान समाज.उस समाज की उत्पन्न शक्ति विश्व को आमंत्रित कर लाइ,अपने घर के विशाल आंगन में.भ्रातृत्व,बंधुत्व और प्रेम की मशाल जलाकर ,भारत विश्व के कोने-कोने में पहुंचा ,प्रेम प्रदीप प्रज्ज्वलित करने के लिए.देखते ही देखते भारत समाज परिणत हुआ वृहत्तर भारत में;ध्यान-ज्ञान के साथ कर्म और धर्म का समन्वय भारत को परिणत किया विश्व समाज में;बंधुत्व हुआ विश्व भ्रातृत्व;वाणिज्य परिणत हुआ विश्व व्यापार में;राजनीति हुई विश्व राजनीति और विद्यालय परिणत हुए विश्व विद्यालय में.आश्चर्यचकित होकर सारा विश्व बौद्ध भारत के चरणों में श्रद्धा अर्पित करने के लिए हुआ बाध्य.बुद्ध के साम्य धर्म का रथ चक्र दुरन्त गति से ,समाज के अत्यंत उर्द्ध्व स्तर में उड़ाकर ले गया आपामर,आर्य-पुत्रों की अवहेलना से बोधशून्य –अछूत व निरादृत बहुजन समाज के नर-नारी को.उनका धम्मचक्र समाज में आर्य उत्तरसूरियों के मस्तक को झुकाकर,बहुजन समाज को बराबर लाने का सार्थक प्रयास किया.वह महज समाज परिवर्तन नहीं, एक सामाजिक क्रांति थी.'

जिस वर्ण-व्यवस्था के जरिये आर्यों ने  शक्ति के स्रोतों  को  अपनी भावी पीढ़ी के लिए चिरस्थाई तौर पर आरक्षित करने की परिकल्पना किया था उसका प्रवर्तन गौतम बुद्ध के उदय के एक हज़ार वर्ष पूर्व हुआ था.शुद्धोधन पुत्र सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध के रूप में परिणत प्राचीन विश्व का पहला और सर्वश्रेष्ठ मानवता प्रेमी वर्ण-व्यवस्था द्वारा खड़ी की गई भयावह आर्थिक और सामजिक विषमता देखकर द्रवित हो उठा .उसने पाया बहुसंख्यक लोगों की करुणतर स्थिति तलवार नहीं,धर्मशास्त्त्रों द्वारा थोपी हुई है.धर्मशास्त्रों द्वारा वर्ण-व्यवस्था को ईश्वर सृष्ट प्रचारित किये जाने के कारण शुद्रातिशूद्र बहुजन समाज दैविक-दास में परिणत एवं वीभत्स संतोषबोध का शिकार हो गया है.उसमें  निज उन्नति की  चाह  ही मर चुकी है.धर्म शास्त्रों द्वारा कर्म-संकरता को अधर्म घोषित  किये जाने के कारण वह नरक-भय से उन पेशों को अपनाने से डर रहा है,जिसे अपनाकर सुविधाभोगी तबका सुख-समृद्धि का भोग कर रहा  है.ऐसे में जरुरत थी एक ऐसे मनोवैज्ञानिक प्रयास की थी जिससे बहुजन ईश्वर-धर्म और आत्मा –परमात्मा के चक्करों से मुक्त हो सके.इसके लिए उन्होंने लोगों को समझाया-'किसी बात पर,चाहे किसी धर्म-ग्रन्थ में लिखा हो या किसी बड़े आदमी ने कही हो,अथवा धर्मगुरु ने कही हो ,बिना सोचे समझे विश्वास मत करो.उसे सुनकर उस पर विचार करके देखो ,यदि वह तुम्हारे कल्याण के लिए हो ,समाज और देश के लिए कल्याणकारी हो ,तभी उसे मानो,अन्यथा त्याग दो और 'अपना दीपक खुद बनो'.धर्म शास्त्रों और ईश्वर से वंचितों को मुक्त करने लिए तमाम धर्मो के प्रवर्तकों में सिर्फ गौतम बुद्ध ही ऐसी साहसिक वाणी इसलिए उच्चारित कर सके क्योकि वे खुद को 'मोक्षदाता' नहीं 'मार्गदाता' मानते थे.प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान् डॉ.अंगने लाल के शब्दों में उनका 'अप्प डिपो भव' सन्देश बौद्ध धर्म के आर्थिक दर्शन का आधार स्तम्भ है.

गौतम बुद्ध का उपरोक्त प्रयास महज़ उपदेश देने तक सिमित नहीं रहा.यह उनके लिए एक मिशन था और इसके लिए उन्होंने पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं(भिक्षुओं) की फौज खड़ी की .इस मिशन को अंजाम तक पहुँचाने के लिए ही धरती की छाती पर पहली बार सन्यासिनियों का संघ(भिक्षुणी संघ) वजूद में आया.इन संघों को चलने के लिए विपुल धन की जरुरत थी.अपने सम्मोहनकारी व्यक्तित्व और राज परिवार का सदस्य होने के कारण धन संग्रह हेतु तत्कालीन राजाओं,धन्नासेठों और साहूकारों को सहमत करने में तथागत को कोई दिक्कत ही नहीं हुई .उनके प्रयास से कोटि-कोटि स्वर्ण-मुद्रा,बेहिसाब धन और भू-सम्पदा संघों  में जमा हुई.पर,उस सम्पदा पर व्यक्तिगत स्वामित्व निषेध रहा.बुद्ध का  मानना था व्यक्तिगत सम्पति ही वंचना ,शोषण का कारण है.इसलिए उन्होंने हजारों बौद्ध संघों  के लाखों भिक्षुओं के मध्य व्यक्तिगत संपत्ति की सृष्टि  वर्जित कर रखी थी.सुई-धागा ,भिक्षा की कटोरी और दो टुकड़ा चीवर से अधिक सम्पति का स्वामित्व किसी को भिक्षु को सुलभ नहीं था.राजतांत्रिक नहीं गणतांत्रिक पद्धति से परिचालित होते थे संघ.आधुनिक साम्यवाद के उदय के दो हज़ार वर्ष पूर्व विश्व के प्रथम साम्यवादी गौतम बुद्ध के सौजन्य साम्यवाद की स्थापना  हुई थी जहा संघ की विपुल सम्पदा पर व्यक्तिगत नहीं,समग्र समाज का अधिकार रहा.

वैदिकोत्तर भारत में आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे के लिए बुद्ध द्वारा लिया गया विराट संगठित प्रयास रंग लाया जिसके फलस्वरूप वर्ण-व्यवस्था में शिथिलता आई.वर्ण-व्यवस्था में शिथिलता के परिणामस्वरूप पेशों की विचलनशीलता (प्रोफेशनल मोबिलिटी) में बाढ़ आई.धर्म शास्त्रों से भयमुक्त बहुजन अब उन पेशों को स्वतः-स्फूर्त रूप से अपनाने में आगे आये जो सिर्फ वैदिकों के वंशधरों के लिए आरक्षित थे.फलतः निःशुल्क दास के रूप में परिणत बहुजन नए जोश के साथ उद्योग-व्यापार ,कला-संस्कृति के क्षेत्र में अपना सर्वोत्तम देने और अपनी पतिभा का लोहा मनवाने की दिशा में आगे बढे.अब राष्ट्र को मिला विशाल मानव संसाधन.सकल जनता की प्रचेष्टा और प्रतियोगिता  की यौथशक्ति बनी समाज और राष्ट्र के उत्थान का कारक. वैदिकों से अवहेलित दलित-बहुजन समाज बुद्ध प्रदत समत्व के अधिकार से समृद्ध होकर हाथ में उठा लिया हसुआ-हथौड़ी,हल और पोथी,तलवार और तूलिका तथा स्थापित कर डाला विशाल साम्राज्य.इस क्रम में  भारत ने उद्योग-व्यापार,ज्ञान –विज्ञान,कला-संस्कृति में अंतरराष्ट्रीय बुलंदियों को छुवा और बौद्ध –भारत बना भारतीय  इतिहास का स्वर्ण काल.

किन्तु देश-प्रेमशून्य विदेशागत आर्यों को इस देश के धर्म को विश्व धर्म;व्यवसाय-वाणिज्य को विश्व-व्यापर;राजनीति को विश्व –राजनीति और विद्यालयों को विश्व-विद्यालयों में परिणत होना अच्छा नहीं लगा.क्योंकि यह सामजिक परिवर्तन नहीं ,सामाजिक क्रांति थी जो हिन्दू-आरक्षण (वर्ण-व्यवस्था) के ध्वंस की बुनियाद पर हुई थी.हिन्दू-आरक्षण के ध्वंस का मतलब सम्पदा-संसाधनों को परंपरागत अल्पजन सुविधाभोगियों के हाथ से निकाल कर शुद्रातिशूद्र बहुजनों के हाथ में ले जाना था.ऐसे में हिन्दू-आरक्षण की पुनर्स्थापना की फिराक में बैठे पुष्यमित्र शुंग ने आखरी बौद्ध राजा,महान सम्राट अशोक के वंशधर बृहद्र्थ की हत्या कर आर्यवादी सत्ता की पुनर्प्रतिष्ठा कर डाली.डॉ.आंबेडकर ने पुष्यमित्र शुंग की गद्दीनशीनी को फ़्रांस की क्रान्ति से भी बड़ी घटना माना है.यह गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति के उलट एक प्रतिक्रांति थी.आम इतिहासकार आंबेडकर की भांति भले ही पुष्यमित्र के राज्यारोहण को  दूरगामी परिणाम देनेवाला न मानते हों,पर सभी इस बात से सहमत हैं कि उसने वर्ण-व्यवस्था को दृढतर करने में अपनी सत्ता का भरपूर इस्तेमाल किया.वर्ण-व्यवस्था को दृढतर करने का मतलब यही हुआ कि उसने वर्णवादी आरक्षण को मजबूती प्रदान कर संपदा,संसाधनों,उच्चमान के पेशों में बहुजनों की भागीदारी को पुनः न्यून एवं अल्पजन आर्यों का एकाधिकार स्थापित कर डाला .फलतः बौद्ध भारत गौतम बुद्ध पूर्व की स्थिति में जाने के लिए अभिशप्त हुआ.

दिनांक:20 मई,2013            



Lenin Raghuvanshi giving bouquet to Min Ko Naing(http://en.wikipedia.org/wiki/Min_Ko_Naing) receiving Gwangju Prize for Human Rights 2009 (http://www.elevenmyanmar.com/politics/3195-min-ko-naing-to-visit-korea-and-us) at World Forum of Human Rights cities on 16 May 2013 with hand of Chairperson of May 18 Foundation and Mayor of Gawngju,South Korea.

Lenin Raghuvanshi giving bouquet to Min Ko Naing(http://en.wikipedia.org/wiki/Min_Ko_Naing) receiving Gwangju Prize for Human Rights 2009 (http://www.elevenmyanmar.com/politics/3195-min-ko-naing-to-visit-korea-and-us) at World Forum of Human Rights cities on 16 May 2013 with hand of Chairperson of May 18 Foundation and Mayor of Gawngju,South Korea.
Like ·  ·  ·  · 3 hours ago

We have forgotten our promise for Millennium Goal. অপুষ্টির সর্বশেষ স্তর হল অনাহার যা চিরস্থায়ী শারীরিক বিকলাঙ্গতা এবং মৃত্যু কারণ হতে পারে।


  • We have forgotten our promise for Millennium Goal. 



    অপুষ্টির সর্বশেষ স্তর হল অনাহার যা চিরস্থায়ী শারীরিক বিকলাঙ্গতা এবং মৃত্যু কারণ হতে পারে।
    দারিদ্রতা,দীর্ঘদিন না খেতে পাওয়ার কারনে অনাহারে মৃত্যুর খবর আমলা শোলের ঘটনা থেকে মানুষের সামনে আসতে শুরু করে। জলপাইগুড়ির চা বাগান থেকে উঠে আসে কঙ্কালসার মানুষগুলির খবর। ঘাস পাতা শিকড় বাকড় খেয়ে তাদের অনেকেই বিকলাঙ্গ। অনেকেই অকালে মারা গেছে। মানবাধিকার সংগঠনগুলির পক্ষ থেকে বারবার একথা জানালেও কোন সরকার অনাহারে মৃত্যু স্বীকার করেনি।
    বরং রোগ এবং বয়সের ভারে মৃত্যু বলে চালাতে সচেষ্ট হয়েছেন বেশি। কোন কোন ক্ষেত্রে অনাহারে মৃত্যুর স্বীকৃতি আদায় করতে আদালতের রায় পর্যন্ত অপেক্ষা করতে হয়েছে। আদালতের রায় সরকার মেনে নিতে বাদ্ধ হলেও এই ঘটনা থেকে কোন শিক্ষা লাভ করেনি। বরং ধামাচাপা দেবার জন্য বেশী সচেষ্ট হয়েছেন। অবহেলা ও কুটিলতার এই ছিদ্র ধরেই অনাহার ছড়িয়ে পড়েছে। বিকলাঙ্গতা ও মৃত্যু হানা দিচ্ছে প্রত্যেক জেলায়। বিভিন্ন সমীক্ষা থেকে উঠে আসছে যে,এই মৃত্যু ও বিকলাঙ্গতার শিকার হচ্ছে শিশু ও বয়স্করা।

    ২০১২ সালের ১৩ই আগস্ট মালদা জেলার হাবিবপুর ব্লকের আকতাই গ্রাম পঞ্চায়েত থেকে অনাহারের খবর আসতে শুরু করে। ছাত্তারা খুদিপুরের ৭৫ বছর বয়স্ক জাওয়া বেসরার অনাহার পীড়িত হওয়ার খবর প্রিন্ট মিডিয়াতে প্রকাশিত হয়। মালদা সহযোগিতা সমিতির কর্মীরা সমীক্ষা করে জানতে পারেন যে অধিকাংশ আদিবাসী বৃদ্ধ বৃদ্ধাদের অবস্থা জাওয়া বেসরার মতই। ভিক্ষা বৃত্তি তাদের একমাত্র উপায়।
    বর্তমান রাজ্য সরকার ক্ষমতায় আসার পর খাদ্য ও কাজের অধিকার অভিযান-পশ্চিমবঙ্গের পক্ষ থেকে ১৩টি অনাহার জনিত মৃত্যুর কথা তুলে ধরা হয়। দুঃখের কথা হল,সরকারী তরফ থেকে একটি মৃত্যুকেও স্বীকৃতি দেওয়া হয়নি। উত্তর বঙ্গের চা বাগান অঞ্চলে সফর কালে অনাহারে মৃত্যু হলেও খাদ্যমন্ত্রী তা স্বীকার করেন নি। কান থাকতেও শুনতে পান নি। চোখ থাকতেও দেখতে পান নি। আর মুখ থাকলেও বলতে পারেন নি। সরকারী প্রোটকল এমনই গ্যাঁড়াকল। কোন ক্ষেত্রে সহজেই খোলে আবার কোন ক্ষেত্রে শ্বাসরোধক হয়ে ওঠে। 

    এমন চলতে থাকলেতো আবার প্রতিশ্রুতি পূরণ হয়না। অথচ আমরা আন্তর্জাতিক জাতি সংঘে প্রতিশ্রুতি বদ্ধ হয়েছি যে ২০১৫ সালের মধ্যে ক্ষুধা ও অনাহার থেকে দেশকে রক্ষা করব। সার্বিক ভাবে দেশের প্রতিটি নাগরিকের খাদ্য সুরক্ষিত করে ভারতবর্ষকে ক্ষুধা শূণ্য দেশে রূপান্তরিত করব। যদিও ভারত গর্ব করে বলতে পারে যে এই প্রতিশ্রুতি পূরণের জন্য সে অনেকগুলি গুরুত্বপূর্ণ পদক্ষেপ গ্রহণ করেছে যা পৃথিবীর সর্ব বৃহৎ খাদ্য সুরক্ষা প্রকল্প হিসেবে পরিচিত। এই প্রকল্পগুলির আওতায় গর্ভজাত শিশু থেকে একেবারে মৃত্যু পথ যাত্রীকেও ভাগিদারী দেওয়া হয়েছে। প্রকল্প গুলির তালিকাও বৃহৎ এবং ভারতবর্ষের প্রত্যেকটি মানুষকে এই প্রকল্পগুলির কোন না কোন একটির মধ্যে প্রাপকদের তালিকায় রাখা হয়েছে।

    এখন কথা হল, ২০০০ সালে ১৮টি প্রয়োজনীয় লক্ষ্য মাত্রা ও ৪৮টি নির্দেশ নামা তৈরি করে আন্তর্জাতিক জাতি সংঘের খাদ্য ও কৃষি সংস্থা (FAO) একটি আন্তর্জাতিক ঘোষণা পত্র প্রকাশ করে।
    বিশ্বের সব দেশ নেতারা সেখানে স্বাক্ষর করেন। তারা প্রতিশ্রুতি দেন যে, আন্তর্জাতিক জাতিগুলি দারিদ্রতা, ক্ষুধা, আসুখ, নিরক্ষরতা , প্রাকৃতিক অনুৎকর্ষতা এবং মহিলাদের প্রতি বৈষম্য দূর করবে। মূলতঃ এই ১৮টি বিষয়কে ৮টি ল ক্ষ্যের মধ্যে এনে উন্নয়ণ সাধিত হবে। 
    সহস্রাব্দের উন্নয়ণের ৮ টি লক্ষ্য হল ঃ
    ১) দারিদ্রতা ও ক্ষুধাকে নির্মূল করা।
    ২) সার্বজনীন প্রাথমিক শিক্ষা।
    ৩) লিঙ্গ সমতা ও মহিলাদের স্বশক্তিকরন। 
    ৪) শিশু মৃত্যু কমানো।
    ৫) মানসিক স্বাস্থ্যের উন্নতি বিধান।
    ৬) এইচআইভি/এডস, ম্যালেরিয়া ও অন্যান্য রোগের বিরুদ্ধে লড়াই। 
    ৭) প্রাকৃতিক স্থিতিশীলতা নিশ্চিতকরণ। এবং
    ৮) উন্নয়নের জন্য বিশ্ব-ভাগিদারীত্ব তৈরি করা। 

    এই প্রতিবেদনে দারিদ্রতা ও ক্ষুধা নির্মূল করার বিষয়ের উপর ভারতবর্ষের প্রেক্ষাপটে কিছু প্রয়োজনীয় প্রসঙ্গের উপর গুরত্ব দেওয়া হয়েছিল। আন্তর্জাতিক জাতি সংঘের খাদ্য ও কৃষি সংস্থা (FAO) ২০১০ সালে একটি পরিসংখ্যান দিয়ে দেখান যে, বিশ্বের ৯২৫ মলিয়ন মানুষ দীর্ঘ কালীন ক্ষুধায় পীড়িত। এই তালিকায় আছে ভারতের ৮ টি রাজ্যকে অন্তর্ভুক্ত করা হয়। এই ৮টি রাজ্যে অনাহার পীড়িত মানুষের সংখ্যা আফ্রিকার ২৬টি অতিগরীব দেশের লোক সংখ্যা থেকেও ১১ মিলিয়ন বেশী। পশ্চিমবঙ্গও ভারতের এই ৮টি রাজ্যের অন্যতম। এই জটিল পরিস্থিতি মোকাবিলা করার জন্য আন্তর্জাতিক জাতি সংঘের খাদ্য ও কৃষি সংস্থা (FAO) কৃষির ব্যবস্থা, বনসম্পদ ও জলসম্পদ বিকাশের জন্য বিশ্বের সমস্ত দেশগুলিকে পরামর্শ দিয়েছে। গ্রামীন ক্ষেত্রে কৃষিতে বেশী বিনিয়োগ করে প্রতিটি নাগরিকের খাদ্য সুরক্ষিত করার কথাও বলা হয়েছে । একথা জোর দিয়ে বলা হয়েছে যে ২০১৫ সালের মধ্যে এই প্রতিশ্রুতিগুলি পূরণ করতে প্রত্যেক দেশ যত্নবান হবে। 

    জনগণের বিপুল চাপে বর্তমান সরকার খাদ্যসুরক্ষা বিল সংসদে পেশ করলেও তা সম্পূর্ণ জনবিরোধী একটি বিল। বর্তমান অবস্থায় এই বিল পাশ হলে তা মোটেও ভারতীয় নাগরিকদের খাদ্য সুরক্ষিত করবেনা। জাতীয় খাদ্যের অধিকার অভিযানের পক্ষ থেকে এই বিলের জনবিরোধী দিকগুলি চিহ্নিত করা হয়েছে।
    যে দিকগুলি বিশেষ ভাবে উল্লেখ করা হয়েছে তা নিম্নরূপ ঃ 
    -বর্তমান বিলে দেশের ৩৩% মানুকে খাদ্য সুরক্ষা থেকে বাদ দেওয়া হচ্ছে। 
    -আগের এপিএল, বিপিএল কথাগুলি তুলে দিয়ে প্রাইওরিটি গ্রুপ ও জেনেরেল গ্রুপ করা হয়েছে, যাতে আগের অবস্থার কোন পরিবর্তন হবে না।
    -এই বিলে ক্ষুধার্থ মানুষের সংখ্যা কম করে দেখানো হয়েছে।
    -পরিবার পিছু (৫জন করে) ২৫ কেজি খাদ্য দেবার কথা বলা হয়েছে। যা দিনে একজনের ভাগে ১৬৬ গ্রাম করে দাঁড়ায়। যেখানে সুপ্রিম কোর্ট ৩৫ কেজি খাদ্যশস্য দেবার কথা ঘোষণা করেছিলেন। 
    -প্রাকৃতিক সম্পদের ব্যবহার, কৃষিজাত পণ্যের উৎপাদন, সংগ্রহ , সরবরাহ ও সংরক্ষণ নিয়ে এই বিল একেবারেই নিরব(যা আন্তর্জাতিক জাতি সংঘের খাদ্য ও কৃষি সংস্থা FAO এর নির্দেশিকার পরিপন্থী)।
    -এই বিলে জাঙ্ক ফুড বা বহুজাতিক কোম্পানির তৈরি খাবারের প্রস্তাব রাখা হয়েছে যা মানুষের খাদ্য সার্বভৌমতা ধ্বংস করে দেবে ।
    -এই বিলে সরকার খাদ্যের পরিবর্তে আধার কার্ডের মাধ্যমে নগদ টাকা (ক্যাশ ট্র্যান্সফার) প্রদানের উপর বেশী গুরুত্ব দিয়েছে।
    -খাদ্যের বদলে নগদ টাকা প্রদানের এই প্রস্তাব শিশু ও মহিলাদের স্বাস্থ্যের ক্ষেত্রে ভয়াবহ পরিস্থিতি তৈরি হতে পারে।

    প্রশ্ন উঠছে, সরকার কি ইচ্ছে করেই এই জটিলতা তৈরি করছেন? সুযোগ করে দিচ্ছে্ন কালোবাজারি ও বহুজাতিক কোম্পানিগুলিকে! নিত্য প্রয়োজনীয় দ্রব্যগুলির অসম্ভব মূল্য বৃদ্ধি ঘটিয়ে ইতিমধ্যেই যারা জনজীবনকে দিশাহারা করে তুলেছে? দিন মজুরে পরিণত করে ফেলেছে সংখ্যাগরিষ্ঠ মানুষকে? রাষ্ট্রীয় শ্রমের সবটুকুই চলে যাচ্ছে অনুৎপাদক মুনাফাবাজদের লাভের খাতায়। 
    এই ঘোলা জলে পড়ে মিলেনিয়াম গোলের রাষ্ট্রীয় প্রতিশ্রুতি ফ্যাকাশে হয়ে গেছে। ঝরা পাতার মত ধীরে ধীরে বিবর্ণ হয়ে যাচ্ছে সাইনিং ইন্ডিয়ার গোয়েবলসিয় শ্লোগান। ভারতবর্ষের বর্তমান পরিস্থিতিতে ২০১৫ সালের মধ্যে এই প্রতিশ্রুতি পালন তাই এক অলীক কল্পনা মাত্র।
    Like ·  ·